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बारिश के बाद वाला प्यार
शहर में उस दिन बहुत तेज़ बारिश हो रही थी।
कबीर ऑफिस से घर लौट रहा था। सड़क किनारे एक छोटी-सी चाय की दुकान पर उसकी नज़र एक लड़की पर पड़ी, जो बारिश रुकने का इंतज़ार कर रही थी। उसके हाथ में एक पुरानी-सी किताब थी और चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान।
कबीर ने चाय वाले से पूछा, “भैया, एक चाय देना।”
लड़की ने अचानक उसकी तरफ देखा और बोली, “आपको बारिश पसंद है?”
कबीर मुस्कुराया, “पहले नहीं थी… लेकिन आज से शायद पसंद आने लगे।”
लड़की हँस पड़ी।
“मेरा नाम नैना है।”
“कबीर।”
उस दिन दोनों ने सिर्फ़ दस मिनट बात की, लेकिन कबीर को लगा जैसे वह नैना को बहुत पहले से जानता हो।
अगले दिन कबीर उसी चाय की दुकान पर पहुँच गया।
नैना वहाँ पहले से मौजूद थी।
“आप रोज़ यहाँ आते हैं?” कबीर ने पूछा।
नैना ने मुस्कुराकर कहा, “नहीं… आज पहली बार आई हूँ।”
कबीर समझ गया कि वह उसके लिए आई थी।
धीरे-धीरे उनकी मुलाकातें रोज़ होने लगीं। कभी चाय के साथ बातें होतीं, कभी बिना कुछ कहे दोनों बारिश देखते रहते।
एक शाम नैना ने कबीर से पूछा, “अगर किसी दिन मैं अचानक आपकी ज़िंदगी से चली जाऊँ तो?”
कबीर ने हँसकर कहा, “तो मैं तुम्हें ढूँढ लूँगा।”
नैना की आँखें नम हो गईं।
“वादा?”
“वादा।”
अगली सुबह कबीर को नैना का कोई फोन नहीं आया।
वह चाय की दुकान पर पहुँचा, लेकिन नैना वहाँ नहीं थी।
एक दिन बीता… फिर एक हफ्ता… फिर एक महीना।
कबीर हर शाम उसी जगह जाता रहा।
एक दिन चाय वाले ने उसे एक छोटा-सा लिफाफा दिया।
“वो लड़की आपके लिए छोड़ गई थी।”
कबीर ने काँपते हाथों से खत खोला।
«“कबीर, मुझे पता है तुम मुझे ढूँढोगे। लेकिन मेरे पापा की तबीयत बहुत खराब है और मुझे अपने शहर वापस जाना पड़ा। मैं तुम्हें बिना बताए नहीं जाना चाहती थी, मगर हिम्मत नहीं हुई।
अगर हमारा प्यार सच्चा है, तो शायद किस्मत हमें दोबारा मिलाएगी।”»
खत के आखिरी शब्द थे—
“उस चाय की दुकान पर मेरा इंतज़ार करना।”
कबीर ने खत सीने से लगा लिया।
एक साल बीत गया।
फिर एक शाम वही बारिश हुई।
कबीर हमेशा की तरह चाय की दुकान पर बैठा था।
तभी पीछे से एक आवाज़ आई—
“तुमने मेरा इंतज़ार करना छोड़ा क्यों नहीं?”
कबीर धीरे से पलटा।
नैना सामने खड़ी थी।
कबीर की आँखों में आँसू आ गए।
“मैंने कहा था ना… मैं तुम्हें ढूँढ लूँगा।”
नैना मुस्कुराई।
“और मैंने कहा था… किस्मत हमें दोबारा मिलाएगी।”
बारिश तेज़ हो गई।
कबीर ने उसका हाथ पकड़ लिया।
इस बार दोनों के बीच कोई दूरी नहीं थी।
कुछ रिश्ते रोज़ मिलने से नहीं बनते…
कुछ रिश्ते एक मुलाक़ात में ही उम्रभर के हो जाते हैं।
और उस दिन से वह छोटी-सी चाय की दुकान उनकी प्रेम कहानी की सबसे खूबसूरत याद बन गई।
शहर में उस दिन बहुत तेज़ बारिश हो रही थी।
कबीर ऑफिस से घर लौट रहा था। सड़क किनारे एक छोटी-सी चाय की दुकान पर उसकी नज़र एक लड़की पर पड़ी, जो बारिश रुकने का इंतज़ार कर रही थी। उसके हाथ में एक पुरानी-सी किताब थी और चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान।
कबीर ने चाय वाले से पूछा, “भैया, एक चाय देना।”
लड़की ने अचानक उसकी तरफ देखा और बोली, “आपको बारिश पसंद है?”
कबीर मुस्कुराया, “पहले नहीं थी… लेकिन आज से शायद पसंद आने लगे।”
लड़की हँस पड़ी।
“मेरा नाम नैना है।”
“कबीर।”
उस दिन दोनों ने सिर्फ़ दस मिनट बात की, लेकिन कबीर को लगा जैसे वह नैना को बहुत पहले से जानता हो।
अगले दिन कबीर उसी चाय की दुकान पर पहुँच गया।
नैना वहाँ पहले से मौजूद थी।
“आप रोज़ यहाँ आते हैं?” कबीर ने पूछा।
नैना ने मुस्कुराकर कहा, “नहीं… आज पहली बार आई हूँ।”
कबीर समझ गया कि वह उसके लिए आई थी।
धीरे-धीरे उनकी मुलाकातें रोज़ होने लगीं। कभी चाय के साथ बातें होतीं, कभी बिना कुछ कहे दोनों बारिश देखते रहते।
एक शाम नैना ने कबीर से पूछा, “अगर किसी दिन मैं अचानक आपकी ज़िंदगी से चली जाऊँ तो?”
कबीर ने हँसकर कहा, “तो मैं तुम्हें ढूँढ लूँगा।”
नैना की आँखें नम हो गईं।
“वादा?”
“वादा।”
अगली सुबह कबीर को नैना का कोई फोन नहीं आया।
वह चाय की दुकान पर पहुँचा, लेकिन नैना वहाँ नहीं थी।
एक दिन बीता… फिर एक हफ्ता… फिर एक महीना।
कबीर हर शाम उसी जगह जाता रहा।
एक दिन चाय वाले ने उसे एक छोटा-सा लिफाफा दिया।
“वो लड़की आपके लिए छोड़ गई थी।”
कबीर ने काँपते हाथों से खत खोला।
«“कबीर, मुझे पता है तुम मुझे ढूँढोगे। लेकिन मेरे पापा की तबीयत बहुत खराब है और मुझे अपने शहर वापस जाना पड़ा। मैं तुम्हें बिना बताए नहीं जाना चाहती थी, मगर हिम्मत नहीं हुई।
अगर हमारा प्यार सच्चा है, तो शायद किस्मत हमें दोबारा मिलाएगी।”»
खत के आखिरी शब्द थे—
“उस चाय की दुकान पर मेरा इंतज़ार करना।”
कबीर ने खत सीने से लगा लिया।
एक साल बीत गया।
फिर एक शाम वही बारिश हुई।
कबीर हमेशा की तरह चाय की दुकान पर बैठा था।
तभी पीछे से एक आवाज़ आई—
“तुमने मेरा इंतज़ार करना छोड़ा क्यों नहीं?”
कबीर धीरे से पलटा।
नैना सामने खड़ी थी।
कबीर की आँखों में आँसू आ गए।
“मैंने कहा था ना… मैं तुम्हें ढूँढ लूँगा।”
नैना मुस्कुराई।
“और मैंने कहा था… किस्मत हमें दोबारा मिलाएगी।”
बारिश तेज़ हो गई।
कबीर ने उसका हाथ पकड़ लिया।
इस बार दोनों के बीच कोई दूरी नहीं थी।
कुछ रिश्ते रोज़ मिलने से नहीं बनते…
कुछ रिश्ते एक मुलाक़ात में ही उम्रभर के हो जाते हैं।
और उस दिन से वह छोटी-सी चाय की दुकान उनकी प्रेम कहानी की सबसे खूबसूरत याद बन गई।
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