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वो आखिरी मुलाक़ात ❤️
राघव रोज़ शाम रेलवे स्टेशन के बाहर एक बेंच पर बैठा करता था। उसके हाथ में हमेशा एक छोटी-सी डायरी होती थी, जिसमें वह अपनी जिंदगी की बातें लिखा करता था।
एक दिन अचानक एक लड़की उसके पास आकर बैठ गई।
“क्या मैं यहाँ बैठ सकती हूँ?”
राघव ने मुस्कुराकर कहा, “ये बेंच मेरी नहीं है।”
लड़की हँस पड़ी।
“मेरा नाम सिया है।”
“राघव।”
उस दिन दोनों की मुलाक़ात सिर्फ़ कुछ मिनटों की थी, लेकिन अगले दिन सिया फिर उसी बेंच पर आ गई।
फिर ये रोज़ का सिलसिला बन गया।
वे चाय पीते, बातें करते और आने-जाने वाली ट्रेनों को देखते रहते।
एक दिन सिया ने पूछा, “अगर मैं कभी यहाँ न आई तो?”
राघव ने कहा, “तो मैं इंतज़ार करूँगा।”
सिया ने धीरे से कहा, “इतना इंतज़ार मत करना… कभी-कभी लोग लौटकर नहीं आते।”
राघव ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा, “लेकिन तुम आओगी।”
सिया ने कोई जवाब नहीं दिया।
अगले दिन वह नहीं आई।
फिर अगले दिन भी नहीं।
एक सप्ताह गुजर गया।
राघव रोज़ उसी बेंच पर बैठा रहा।
आख़िरकार एक शाम स्टेशन के एक कर्मचारी ने उसे एक लिफाफा दिया।
“सिया ने आपके लिए छोड़ा था।”
राघव ने काँपते हाथों से खत खोला।
“राघव, मुझे नहीं पता ये खत तुम्हें कब मिलेगा। मुझे अपने इलाज के लिए दूसरे शहर जाना पड़ रहा है। शायद मैं वापस आऊँ, शायद नहीं। लेकिन अगर मैं वापस न आ सकूँ, तो मेरी एक बात याद रखना—मेरी जिंदगी के सबसे खूबसूरत दिन वही थे, जो मैंने तुम्हारे साथ इस बेंच पर बिताए।”
राघव की आँखों से आँसू बहने लगे।
खत के आखिरी पन्ने पर सिर्फ़ एक लाइन लिखी थी—
“अगर प्यार सच्चा हो, तो आखिरी मुलाक़ात भी पूरी जिंदगी साथ रहती है।”
कई साल बीत गए।
राघव की डायरी आज भी उसके पास थी।
एक दिन वह उसी स्टेशन पर बैठा था।
अचानक किसी ने पीछे से कहा—
“तुमने इंतज़ार करना छोड़ा नहीं?”
राघव ने पलटकर देखा।
सिया सामने खड़ी थी।
आँखों में आँसू और चेहरे पर वही पुरानी मुस्कान।
राघव कुछ बोल नहीं पाया।
सिया ने धीरे से कहा—
“मैंने कहा था ना… शायद लौटूँ, शायद नहीं।”
राघव मुस्कुराया।
“मैंने भी कहा था… तुम आओगी।”
और उस शाम स्टेशन पर आने वाली हर ट्रेन से ज़्यादा खूबसूरत था—
उन दोनों का फिर से मिलना। ❤️
राघव रोज़ शाम रेलवे स्टेशन के बाहर एक बेंच पर बैठा करता था। उसके हाथ में हमेशा एक छोटी-सी डायरी होती थी, जिसमें वह अपनी जिंदगी की बातें लिखा करता था।
एक दिन अचानक एक लड़की उसके पास आकर बैठ गई।
“क्या मैं यहाँ बैठ सकती हूँ?”
राघव ने मुस्कुराकर कहा, “ये बेंच मेरी नहीं है।”
लड़की हँस पड़ी।
“मेरा नाम सिया है।”
“राघव।”
उस दिन दोनों की मुलाक़ात सिर्फ़ कुछ मिनटों की थी, लेकिन अगले दिन सिया फिर उसी बेंच पर आ गई।
फिर ये रोज़ का सिलसिला बन गया।
वे चाय पीते, बातें करते और आने-जाने वाली ट्रेनों को देखते रहते।
एक दिन सिया ने पूछा, “अगर मैं कभी यहाँ न आई तो?”
राघव ने कहा, “तो मैं इंतज़ार करूँगा।”
सिया ने धीरे से कहा, “इतना इंतज़ार मत करना… कभी-कभी लोग लौटकर नहीं आते।”
राघव ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा, “लेकिन तुम आओगी।”
सिया ने कोई जवाब नहीं दिया।
अगले दिन वह नहीं आई।
फिर अगले दिन भी नहीं।
एक सप्ताह गुजर गया।
राघव रोज़ उसी बेंच पर बैठा रहा।
आख़िरकार एक शाम स्टेशन के एक कर्मचारी ने उसे एक लिफाफा दिया।
“सिया ने आपके लिए छोड़ा था।”
राघव ने काँपते हाथों से खत खोला।
“राघव, मुझे नहीं पता ये खत तुम्हें कब मिलेगा। मुझे अपने इलाज के लिए दूसरे शहर जाना पड़ रहा है। शायद मैं वापस आऊँ, शायद नहीं। लेकिन अगर मैं वापस न आ सकूँ, तो मेरी एक बात याद रखना—मेरी जिंदगी के सबसे खूबसूरत दिन वही थे, जो मैंने तुम्हारे साथ इस बेंच पर बिताए।”
राघव की आँखों से आँसू बहने लगे।
खत के आखिरी पन्ने पर सिर्फ़ एक लाइन लिखी थी—
“अगर प्यार सच्चा हो, तो आखिरी मुलाक़ात भी पूरी जिंदगी साथ रहती है।”
कई साल बीत गए।
राघव की डायरी आज भी उसके पास थी।
एक दिन वह उसी स्टेशन पर बैठा था।
अचानक किसी ने पीछे से कहा—
“तुमने इंतज़ार करना छोड़ा नहीं?”
राघव ने पलटकर देखा।
सिया सामने खड़ी थी।
आँखों में आँसू और चेहरे पर वही पुरानी मुस्कान।
राघव कुछ बोल नहीं पाया।
सिया ने धीरे से कहा—
“मैंने कहा था ना… शायद लौटूँ, शायद नहीं।”
राघव मुस्कुराया।
“मैंने भी कहा था… तुम आओगी।”
और उस शाम स्टेशन पर आने वाली हर ट्रेन से ज़्यादा खूबसूरत था—
उन दोनों का फिर से मिलना। ❤️
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