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दो टिकट और एक अधूरी कहानी ❤️
रोहन को सफर करना बहुत पसंद था। एक दिन उसने बिना किसी खास वजह के पहाड़ों की ट्रेन की दो टिकटें बुक कर लीं।
स्टेशन पर पहुँचकर उसे एहसास हुआ कि उसने गलती से दो टिकट ले ली थीं।
तभी एक लड़की भागती हुई आई।
“माफ़ कीजिए… क्या ये सीट 42 है?”
रोहन ने टिकट देखा।
“हाँ।”
लड़की ने राहत की साँस ली।
“तो हम साथ सफर करेंगे।”
उसका नाम मेहर था।
ट्रेन चल पड़ी।
पहले दोनों चुप बैठे रहे।
फिर मेहर ने पूछा, “आप अकेले सफर कर रहे हैं?”
रोहन ने कहा, “हाँ। शायद अकेलापन दूर करने।”
मेहर मुस्कुराई।
“और मैं अपने अतीत से दूर भागने।”
दोनों हँस पड़े।
कुछ घंटों में ही बातें इतनी बढ़ गईं कि उन्हें पता ही नहीं चला कि रात कब हो गई।
मेहर ने खिड़की से बाहर देखते हुए कहा—
“क्या आपको लगता है कि दो अजनबी एक-दूसरे की जिंदगी बदल सकते हैं?”
रोहन ने कहा—
“अगर मुलाक़ात सही समय पर हो, तो बिल्कुल।”
सुबह ट्रेन पहाड़ों के बीच पहुँच गई।
मेहर ने रोहन को अपना नंबर दिया।
“शायद सफर यहीं खत्म हो रहा है।”
रोहन ने पूछा, “शायद?”
वह मुस्कुराई।
“अगर किस्मत ने चाहा तो दोबारा मिलेंगे।”
ट्रेन से उतरने के बाद दोनों अलग हो गए।
रोहन ने कई बार फोन किया।
नंबर बंद था।
महीने बीत गए।
एक साल बाद रोहन उसी स्टेशन पर वापस आया।
उसे लगा था कि शायद यह कहानी यहीं खत्म हो गई।
तभी पीछे से आवाज़ आई—
“तुम अभी भी दो टिकट लेते हो?”
रोहन ने पलटकर देखा।
मेहर खड़ी थी।
रोहन की आँखों में खुशी आ गई।
“अब दो नहीं…”
उसने मुस्कुराकर कहा,
“इस बार पूरी जिंदगी की एक टिकट चाहिए।”
मेहर हँसते हुए उसके पास आ गई।
“इतनी लंबी यात्रा के लिए तैयार हो?”
रोहन ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“अगर तुम साथ हो, तो मंज़िल की जरूरत ही नहीं।”
दोनों स्टेशन से बाहर निकल गए।
पीछे ट्रेन अपनी मंज़िल की ओर जा रही थी।
और उनके सामने शुरू हो रही थी—
एक ऐसी यात्रा, जिसमें इस बार कोई विदाई नहीं थी। ❤️
रोहन को सफर करना बहुत पसंद था। एक दिन उसने बिना किसी खास वजह के पहाड़ों की ट्रेन की दो टिकटें बुक कर लीं।
स्टेशन पर पहुँचकर उसे एहसास हुआ कि उसने गलती से दो टिकट ले ली थीं।
तभी एक लड़की भागती हुई आई।
“माफ़ कीजिए… क्या ये सीट 42 है?”
रोहन ने टिकट देखा।
“हाँ।”
लड़की ने राहत की साँस ली।
“तो हम साथ सफर करेंगे।”
उसका नाम मेहर था।
ट्रेन चल पड़ी।
पहले दोनों चुप बैठे रहे।
फिर मेहर ने पूछा, “आप अकेले सफर कर रहे हैं?”
रोहन ने कहा, “हाँ। शायद अकेलापन दूर करने।”
मेहर मुस्कुराई।
“और मैं अपने अतीत से दूर भागने।”
दोनों हँस पड़े।
कुछ घंटों में ही बातें इतनी बढ़ गईं कि उन्हें पता ही नहीं चला कि रात कब हो गई।
मेहर ने खिड़की से बाहर देखते हुए कहा—
“क्या आपको लगता है कि दो अजनबी एक-दूसरे की जिंदगी बदल सकते हैं?”
रोहन ने कहा—
“अगर मुलाक़ात सही समय पर हो, तो बिल्कुल।”
सुबह ट्रेन पहाड़ों के बीच पहुँच गई।
मेहर ने रोहन को अपना नंबर दिया।
“शायद सफर यहीं खत्म हो रहा है।”
रोहन ने पूछा, “शायद?”
वह मुस्कुराई।
“अगर किस्मत ने चाहा तो दोबारा मिलेंगे।”
ट्रेन से उतरने के बाद दोनों अलग हो गए।
रोहन ने कई बार फोन किया।
नंबर बंद था।
महीने बीत गए।
एक साल बाद रोहन उसी स्टेशन पर वापस आया।
उसे लगा था कि शायद यह कहानी यहीं खत्म हो गई।
तभी पीछे से आवाज़ आई—
“तुम अभी भी दो टिकट लेते हो?”
रोहन ने पलटकर देखा।
मेहर खड़ी थी।
रोहन की आँखों में खुशी आ गई।
“अब दो नहीं…”
उसने मुस्कुराकर कहा,
“इस बार पूरी जिंदगी की एक टिकट चाहिए।”
मेहर हँसते हुए उसके पास आ गई।
“इतनी लंबी यात्रा के लिए तैयार हो?”
रोहन ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“अगर तुम साथ हो, तो मंज़िल की जरूरत ही नहीं।”
दोनों स्टेशन से बाहर निकल गए।
पीछे ट्रेन अपनी मंज़िल की ओर जा रही थी।
और उनके सामने शुरू हो रही थी—
एक ऐसी यात्रा, जिसमें इस बार कोई विदाई नहीं थी। ❤️
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