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उसने कहा था, मैं लौटूँगी ❤️
वेद हर शाम समुद्र किनारे बैठकर सूरज डूबते देखता था।
वहाँ उसकी मुलाक़ात एक दिन आरोही से हुई। वह रेत पर बैठी सीपियाँ चुन रही थी।
वेद ने पूछा, “इनका क्या करोगी?”
आरोही ने मुस्कुराकर कहा, “यादें बनाऊँगी।”
“सीपियों से?”
“नहीं… उन पलों से, जिनमें इन्हें उठाया।”
उस दिन से दोनों रोज़ मिलने लगे।
समुद्र उनके मिलने की जगह बन गया।
एक शाम आरोही ने वेद से कहा—
“मुझे अगले महीने दूसरे शहर जाना पड़ेगा।”
वेद का चेहरा उदास हो गया।
“कितने दिनों के लिए?”
आरोही ने कुछ पल चुप रहकर कहा—
“पता नहीं।”
वेद ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“मैं इंतज़ार करूँगा।”
आरोही ने मुस्कुराकर कहा—
“मैं लौटूँगी।”
अगले दिन वह चली गई।
शुरू में फोन आते रहे।
फिर कम हो गए।
फिर एक दिन बिल्कुल बंद हो गए।
वेद हर शाम समुद्र किनारे जाता रहा।
वही जगह।
वही बेंच।
वही डूबता सूरज।
तीन साल गुजर गए।
एक शाम बारिश होने लगी।
वेद उठकर जाने ही वाला था कि उसे रेत पर एक छोटी-सी सीप दिखाई दी।
वही सीप जैसी आरोही ने पहले दिन उठाई थी।
उसके पीछे किसी ने आवाज़ दी—
“तुमने मेरा इंतज़ार करना बंद क्यों नहीं किया?”
वेद ने पलटकर देखा।
आरोही सामने खड़ी थी।
वेद कुछ बोल नहीं पाया।
आरोही की आँखों में आँसू थे।
“मैं बहुत देर से लौटी।”
वेद ने मुस्कुराकर कहा—
“लेकिन तुमने कहा था ना… लौटोगी।”
आरोही उसके पास आई।
“तुम नाराज़ नहीं हो?”
वेद ने सिर हिलाया।
“तुमसे नहीं… उस समय से हूँ जिसने तुम्हें मुझसे दूर रखा।”
दोनों समुद्र की तरफ देखने लगे।
आरोही ने अपनी हथेली खोली।
उसमें एक पुरानी सीप थी।
“इसे संभालकर रखा था।”
वेद मुस्कुराया।
“अब इसे वापस समुद्र में मत जाने देना।”
आरोही ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“अब नहीं।”
सूरज डूब चुका था।
लेकिन इस बार दोनों के लिए एक नई सुबह शुरू हो चुकी थी।
सच्चा प्यार रास्ता भूल सकता है…
लेकिन अपने इंसान तक पहुँचने की वजह कभी नहीं भूलता। ❤️
वेद हर शाम समुद्र किनारे बैठकर सूरज डूबते देखता था।
वहाँ उसकी मुलाक़ात एक दिन आरोही से हुई। वह रेत पर बैठी सीपियाँ चुन रही थी।
वेद ने पूछा, “इनका क्या करोगी?”
आरोही ने मुस्कुराकर कहा, “यादें बनाऊँगी।”
“सीपियों से?”
“नहीं… उन पलों से, जिनमें इन्हें उठाया।”
उस दिन से दोनों रोज़ मिलने लगे।
समुद्र उनके मिलने की जगह बन गया।
एक शाम आरोही ने वेद से कहा—
“मुझे अगले महीने दूसरे शहर जाना पड़ेगा।”
वेद का चेहरा उदास हो गया।
“कितने दिनों के लिए?”
आरोही ने कुछ पल चुप रहकर कहा—
“पता नहीं।”
वेद ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“मैं इंतज़ार करूँगा।”
आरोही ने मुस्कुराकर कहा—
“मैं लौटूँगी।”
अगले दिन वह चली गई।
शुरू में फोन आते रहे।
फिर कम हो गए।
फिर एक दिन बिल्कुल बंद हो गए।
वेद हर शाम समुद्र किनारे जाता रहा।
वही जगह।
वही बेंच।
वही डूबता सूरज।
तीन साल गुजर गए।
एक शाम बारिश होने लगी।
वेद उठकर जाने ही वाला था कि उसे रेत पर एक छोटी-सी सीप दिखाई दी।
वही सीप जैसी आरोही ने पहले दिन उठाई थी।
उसके पीछे किसी ने आवाज़ दी—
“तुमने मेरा इंतज़ार करना बंद क्यों नहीं किया?”
वेद ने पलटकर देखा।
आरोही सामने खड़ी थी।
वेद कुछ बोल नहीं पाया।
आरोही की आँखों में आँसू थे।
“मैं बहुत देर से लौटी।”
वेद ने मुस्कुराकर कहा—
“लेकिन तुमने कहा था ना… लौटोगी।”
आरोही उसके पास आई।
“तुम नाराज़ नहीं हो?”
वेद ने सिर हिलाया।
“तुमसे नहीं… उस समय से हूँ जिसने तुम्हें मुझसे दूर रखा।”
दोनों समुद्र की तरफ देखने लगे।
आरोही ने अपनी हथेली खोली।
उसमें एक पुरानी सीप थी।
“इसे संभालकर रखा था।”
वेद मुस्कुराया।
“अब इसे वापस समुद्र में मत जाने देना।”
आरोही ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“अब नहीं।”
सूरज डूब चुका था।
लेकिन इस बार दोनों के लिए एक नई सुबह शुरू हो चुकी थी।
सच्चा प्यार रास्ता भूल सकता है…
लेकिन अपने इंसान तक पहुँचने की वजह कभी नहीं भूलता। ❤️
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