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वो सीट नंबर 17 ❤️

अर्जुन हर सोमवार सुबह एक ही ट्रेन से ऑफिस जाता था। उसकी सीट हमेशा 17 नंबर होती थी।

एक दिन उसकी सीट पर एक लड़की बैठी थी।

अर्जुन ने टिकट दिखाते हुए कहा, “माफ़ कीजिए, ये मेरी सीट है।”

लड़की ने अपना टिकट देखा और घबरा गई।

“ओह! मेरी भी सीट 17 है।”

दोनों ने टिकट दोबारा देखा।

असल में ट्रेन के अलग-अलग कोच में सीट नंबर 17 था।

लड़की का नाम सारा था।

अर्जुन ने मुस्कुराकर कहा, “तो आज किस्मत ने हमें एक ही नंबर पर बैठा दिया।”

सारा हँस पड़ी।

उस दिन दोनों की अच्छी दोस्ती हो गई।

अगले सोमवार अर्जुन ने देखा कि सारा फिर उसी ट्रेन में थी।

“आपकी सीट कौन-सी है?”

सारा ने मुस्कुराकर कहा—

“आज भी 17।”

अर्जुन समझ गया कि ये संयोग नहीं था।

फिर हर सोमवार दोनों साथ सफर करने लगे।

कभी चाय, कभी किताबें, कभी खिड़की के बाहर बदलते शहर…

छोटा-सा सफर कब प्यार में बदल गया, उन्हें पता ही नहीं चला।

एक दिन सारा ने कहा—

“अर्जुन, अगले महीने मैं इस शहर से हमेशा के लिए जा रही हूँ।”

अर्जुन का चेहरा उतर गया।

“फिर हमारी सीट 17?”

सारा ने मुस्कुराकर कहा—

“सीट तो वही रहेगी… बस मैं नहीं रहूँगी।”

अगले महीने अर्जुन अकेला ट्रेन में बैठा था।

सीट नंबर 17 खाली थी।

उसने पहली बार महसूस किया कि वही सीट, जो कभी छोटी लगती थी, अब पूरी ट्रेन से भी बड़ी लग रही थी।

उसने जेब से सारा की दी हुई छोटी-सी पर्ची निकाली।

उस पर लिखा था—

“अगर किसी दिन मेरी याद आए, तो सीट 17 पर बैठना। शायद मेरी याद तुम्हारे पास आकर बैठ जाए।”

कई महीने बाद अर्जुन को उसी ट्रेन में एक आवाज़ सुनाई दी—

“क्या मैं यहाँ बैठ सकती हूँ?”

अर्जुन ने पलटकर देखा।

सारा सामने थी।

उसने मुस्कुराकर पूछा—

“तुम वापस आ गई?”

सारा ने कहा—

“हाँ।”

“क्यों?”

सारा ने सीट की तरफ देखते हुए कहा—

“क्योंकि मुझे समझ आ गया कि मेरा घर कोई शहर नहीं…”

वह अर्जुन के पास बैठ गई।

“…मेरा घर तुम हो।”

अर्जुन की आँखों में आँसू आ गए।

ट्रेन आगे बढ़ती रही।

और सीट नंबर 17 पर इस बार सिर्फ़ दो यात्री नहीं थे—

दो लोग थे, जिन्हें अपनी मंज़िल मिल चुकी थी। ❤️
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