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जब उसने मेरा नाम पुकारा ❤️
अभय को हर शाम पार्क में टहलने की आदत थी।
एक दिन उसने देखा कि एक लड़की रोज़ उसी बेंच पर बैठती है और हाथ में एक डायरी लेकर कुछ लिखती रहती है।
उसका नाम मीरा था।
कई दिनों तक दोनों सिर्फ़ एक-दूसरे को देखते रहे।
फिर एक शाम मीरा ने अचानक पूछा—
“आप रोज़ यहाँ आते हैं?”
अभय ने मुस्कुराकर कहा, “हाँ।”
“क्यों?”
“शायद किसी के आने का इंतज़ार है।”
मीरा ने डायरी बंद कर दी।
“किसका?”
अभय ने उसकी तरफ देखते हुए कहा—
“शायद आपका।”
मीरा मुस्कुरा दी।
उस दिन के बाद दोनों रोज़ मिलने लगे।
मीरा अभय को अपनी छोटी-छोटी परेशानियाँ बताती और अभय उसकी हर बात ध्यान से सुनता।
एक दिन मीरा ने कहा—
“तुम्हारे साथ बैठकर लगता है कि जिंदगी थोड़ी आसान है।”
अभय ने कहा—
“तो हमेशा मेरे साथ बैठा करो।”
मीरा ने उसकी तरफ देखा, लेकिन कुछ नहीं कहा।
कुछ दिनों बाद मीरा अचानक पार्क आना बंद हो गई।
अभय ने कई दिनों तक इंतज़ार किया।
फिर एक शाम उसे उसी बेंच पर एक डायरी मिली।
उसने डायरी खोली।
पहले पन्ने पर लिखा था—
“अभय के नाम।”
अगले पन्ने पर—
“तुम्हें बताना चाहती थी कि मुझे तुमसे प्यार हो गया है। लेकिन मुझे एक बीमारी है, जिसका इलाज लंबा चलेगा। मैं नहीं चाहती कि मेरी वजह से तुम्हारी जिंदगी रुक जाए।”
अभय की आँखों में आँसू आ गए।
डायरी के आखिरी पन्ने पर एक अस्पताल का नाम लिखा था।
अभय उसी रात वहाँ पहुँचा।
मीरा खिड़की के पास बैठी थी।
अभय को देखकर वह चौंक गई।
“तुम यहाँ क्यों आए?”
अभय ने कहा—
“क्योंकि तुमने मेरी जिंदगी आसान करने की बात कही थी।”
मीरा की आँखों में आँसू आ गए।
“लेकिन मैं तुम्हें दुख दे सकती हूँ।”
अभय ने उसका हाथ थाम लिया।
“प्यार का मतलब सिर्फ़ खुशियों में साथ रहना नहीं होता।”
मीरा ने पहली बार उसका नाम लेकर कहा—
“अभय…”
उस एक शब्द में इतनी भावनाएँ थीं कि वह कुछ बोल नहीं पाया।
इलाज लंबा चला।
कुछ दिन अच्छे रहे, कुछ मुश्किल।
लेकिन अभय हर दिन उसके साथ रहा।
कई महीनों बाद मीरा पहली बार अस्पताल से बाहर निकली।
दोनों उसी पार्क में पहुँचे।
मीरा उसी पुरानी बेंच पर बैठ गई।
उसने मुस्कुराकर पूछा—
“अब भी किसी के आने का इंतज़ार है?”
अभय ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“नहीं।”
“क्यों?”
“क्योंकि जिसे ढूँढ रहा था, वो मेरे पास बैठी है।”
मीरा मुस्कुरा दी।
और उस दिन पहली बार उस पार्क की बेंच सिर्फ़ एक जगह नहीं रही—
वह उनके प्यार की पहचान बन गई। ❤️
अभय को हर शाम पार्क में टहलने की आदत थी।
एक दिन उसने देखा कि एक लड़की रोज़ उसी बेंच पर बैठती है और हाथ में एक डायरी लेकर कुछ लिखती रहती है।
उसका नाम मीरा था।
कई दिनों तक दोनों सिर्फ़ एक-दूसरे को देखते रहे।
फिर एक शाम मीरा ने अचानक पूछा—
“आप रोज़ यहाँ आते हैं?”
अभय ने मुस्कुराकर कहा, “हाँ।”
“क्यों?”
“शायद किसी के आने का इंतज़ार है।”
मीरा ने डायरी बंद कर दी।
“किसका?”
अभय ने उसकी तरफ देखते हुए कहा—
“शायद आपका।”
मीरा मुस्कुरा दी।
उस दिन के बाद दोनों रोज़ मिलने लगे।
मीरा अभय को अपनी छोटी-छोटी परेशानियाँ बताती और अभय उसकी हर बात ध्यान से सुनता।
एक दिन मीरा ने कहा—
“तुम्हारे साथ बैठकर लगता है कि जिंदगी थोड़ी आसान है।”
अभय ने कहा—
“तो हमेशा मेरे साथ बैठा करो।”
मीरा ने उसकी तरफ देखा, लेकिन कुछ नहीं कहा।
कुछ दिनों बाद मीरा अचानक पार्क आना बंद हो गई।
अभय ने कई दिनों तक इंतज़ार किया।
फिर एक शाम उसे उसी बेंच पर एक डायरी मिली।
उसने डायरी खोली।
पहले पन्ने पर लिखा था—
“अभय के नाम।”
अगले पन्ने पर—
“तुम्हें बताना चाहती थी कि मुझे तुमसे प्यार हो गया है। लेकिन मुझे एक बीमारी है, जिसका इलाज लंबा चलेगा। मैं नहीं चाहती कि मेरी वजह से तुम्हारी जिंदगी रुक जाए।”
अभय की आँखों में आँसू आ गए।
डायरी के आखिरी पन्ने पर एक अस्पताल का नाम लिखा था।
अभय उसी रात वहाँ पहुँचा।
मीरा खिड़की के पास बैठी थी।
अभय को देखकर वह चौंक गई।
“तुम यहाँ क्यों आए?”
अभय ने कहा—
“क्योंकि तुमने मेरी जिंदगी आसान करने की बात कही थी।”
मीरा की आँखों में आँसू आ गए।
“लेकिन मैं तुम्हें दुख दे सकती हूँ।”
अभय ने उसका हाथ थाम लिया।
“प्यार का मतलब सिर्फ़ खुशियों में साथ रहना नहीं होता।”
मीरा ने पहली बार उसका नाम लेकर कहा—
“अभय…”
उस एक शब्द में इतनी भावनाएँ थीं कि वह कुछ बोल नहीं पाया।
इलाज लंबा चला।
कुछ दिन अच्छे रहे, कुछ मुश्किल।
लेकिन अभय हर दिन उसके साथ रहा।
कई महीनों बाद मीरा पहली बार अस्पताल से बाहर निकली।
दोनों उसी पार्क में पहुँचे।
मीरा उसी पुरानी बेंच पर बैठ गई।
उसने मुस्कुराकर पूछा—
“अब भी किसी के आने का इंतज़ार है?”
अभय ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“नहीं।”
“क्यों?”
“क्योंकि जिसे ढूँढ रहा था, वो मेरे पास बैठी है।”
मीरा मुस्कुरा दी।
और उस दिन पहली बार उस पार्क की बेंच सिर्फ़ एक जगह नहीं रही—
वह उनके प्यार की पहचान बन गई। ❤️
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