Post
View post and interactions

Story Maker
आख़िरी इंतज़ार
बारिश की उस शाम स्टेशन पर सिर्फ़ एक बूढ़ा आदमी बैठा था। उसकी आँखें बार-बार प्लेटफ़ॉर्म की ओर उठतीं और फिर झुक जातीं।
उसके हाथ में एक पुराना ख़त था।
बीस साल पहले उसकी बेटी घर छोड़कर शहर गई थी। जाते समय उसने कहा था, “पापा, जल्दी वापस आऊँगी।”
उस दिन से बूढ़ा हर शाम उसी स्टेशन पर आकर बैठता था।
लोग आते, ट्रेनें जातीं, मौसम बदलते रहे… लेकिन उसकी बेटी नहीं लौटी।
एक दिन स्टेशन मास्टर ने पूछा, “बाबा, आप रोज़ यहाँ किसका इंतज़ार करते हैं?”
बूढ़ा मुस्कुराया और बोला, “मेरी बेटी का… उसने कहा था ना, जल्दी लौटूँगी।”
उस रात बूढ़ा घर नहीं लौटा।
अगली सुबह उसकी कुर्सी खाली थी। पास में वही पुराना ख़त पड़ा था।
ख़त के आख़िरी शब्द थे—
“पापा, अगर मैं कभी वापस न आ पाऊँ… तो मेरा इंतज़ार मत करना।”
लेकिन कुछ रिश्ते ख़त पढ़कर भी इंतज़ार करना नहीं छोड़ते।
बारिश की उस शाम स्टेशन पर सिर्फ़ एक बूढ़ा आदमी बैठा था। उसकी आँखें बार-बार प्लेटफ़ॉर्म की ओर उठतीं और फिर झुक जातीं।
उसके हाथ में एक पुराना ख़त था।
बीस साल पहले उसकी बेटी घर छोड़कर शहर गई थी। जाते समय उसने कहा था, “पापा, जल्दी वापस आऊँगी।”
उस दिन से बूढ़ा हर शाम उसी स्टेशन पर आकर बैठता था।
लोग आते, ट्रेनें जातीं, मौसम बदलते रहे… लेकिन उसकी बेटी नहीं लौटी।
एक दिन स्टेशन मास्टर ने पूछा, “बाबा, आप रोज़ यहाँ किसका इंतज़ार करते हैं?”
बूढ़ा मुस्कुराया और बोला, “मेरी बेटी का… उसने कहा था ना, जल्दी लौटूँगी।”
उस रात बूढ़ा घर नहीं लौटा।
अगली सुबह उसकी कुर्सी खाली थी। पास में वही पुराना ख़त पड़ा था।
ख़त के आख़िरी शब्द थे—
“पापा, अगर मैं कभी वापस न आ पाऊँ… तो मेरा इंतज़ार मत करना।”
लेकिन कुछ रिश्ते ख़त पढ़कर भी इंतज़ार करना नहीं छोड़ते।
0
0

Comments
0No comments yet
Be the first to comment