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माँ की आख़िरी चिट्ठी

राहुल अपनी माँ से अक्सर कहता था, “माँ, अभी बहुत काम है… बाद में बात करूँगा।”

माँ हर बार मुस्कुराकर कहती, “ठीक है बेटा, अपना ख्याल रखना।”

एक दिन राहुल को शहर में बड़ी नौकरी मिल गई। वह गाँव से शहर चला गया। शुरुआत में वह रोज़ माँ को फोन करता था, फिर हफ्ते में एक बार… और धीरे-धीरे फोन करना भी बंद कर दिया।

माँ फिर भी हर रविवार उसके फोन का इंतज़ार करती।

एक सुबह राहुल के पास गाँव से फोन आया।

“बेटा… माँ नहीं रहीं।”

राहुल के हाथ से फोन गिर गया।

वह उसी दिन गाँव पहुँचा। माँ के कमरे में उसे एक छोटी-सी डायरी मिली। आख़िरी पन्ने पर लिखा था—

“आज राहुल का फोन नहीं आया। शायद बहुत व्यस्त होगा। कोई बात नहीं… जब आएगा, तब खूब बातें करूँगी।”

राहुल फूट-फूटकर रो पड़ा।

उसने पहली बार महसूस किया कि दुनिया में सबसे दुखद आवाज़ फोन की घंटी नहीं बजना नहीं होती…

सबसे दुखद एहसास होता है—जिस इंसान को फोन करना था, उसके पास अब फोन उठाने का समय ही नहीं है।
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