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वह आख़िरी मुलाक़ात

आकाश और नेहा एक-दूसरे से बहुत प्यार करते थे। दोनों ने साथ जीने के सपने देखे थे।

एक दिन नेहा ने कहा, “आकाश, अगर कभी मैं तुमसे दूर हो जाऊँ तो मुझे भूल जाना।”

आकाश हँसकर बोला, “तुम्हारे बिना रहना मेरे बस की बात नहीं।”

कुछ दिनों बाद नेहा अचानक शहर छोड़कर चली गई। आकाश ने बहुत फोन किए, संदेश भेजे, लेकिन कोई जवाब नहीं आया।

सालों बीत गए।

एक शाम आकाश उसी पुराने पार्क में बैठा था, जहाँ वे पहली बार मिले थे। तभी एक छोटा बच्चा उसके पास आया और बोला, “अंकल, ये चिट्ठी आपकी है।”

आकाश ने काँपते हाथों से चिट्ठी खोली।

उसमें लिखा था—

“आकाश, मुझे पता है तुम मुझे बहुत ढूँढोगे। लेकिन मैं चाहती हूँ कि तुम अपनी ज़िंदगी जीओ। मुझे एक ऐसी बीमारी है जिसका इलाज नहीं है। मैं नहीं चाहती थी कि मेरी वजह से तुम्हारी पूरी ज़िंदगी इंतज़ार बन जाए।”

नीचे सिर्फ़ एक लाइन थी—

“काश, हमारी आख़िरी मुलाक़ात में मुझे पता होता कि वो आख़िरी है… तो मैं तुम्हें जाने ही नहीं देती।”

आकाश ने चिट्ठी सीने से लगा ली।

उस दिन पहली बार उसे समझ आया—

कुछ लोग हमारी ज़िंदगी से चले जाते हैं, लेकिन उनकी यादें कभी नहीं जातीं।
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