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खाली कुर्सी
हर शाम अमन अपने घर की बालकनी में दो कुर्सियाँ लगाता था।
एक पर वह बैठता और दूसरी कुर्सी हमेशा खाली रहती।
पड़ोसी अक्सर पूछते, “अमन, दूसरी कुर्सी पर कौन बैठता है?”
वह बस मुस्कुराकर कहता, “मेरी पत्नी।”
लेकिन उसकी पत्नी को गुज़रे तीन साल हो चुके थे।
एक रात पड़ोसी ने हिम्मत करके पूछा, “आप अब भी उनका इंतज़ार करते हैं?”
अमन ने खाली कुर्सी को देखते हुए कहा, “इंतज़ार नहीं करता… बस आदत नहीं बदली।”
फिर उसने धीरे से कहा, “वो रोज़ मेरे पास बैठकर चाय पीती थी। अब चाय सिर्फ़ एक कप बनती है, लेकिन कुर्सी दो ही लगती हैं।”
उस रात अमन की आँखों से आँसू बहते रहे।
सुबह पड़ोसी ने देखा—बालकनी में पहली बार सिर्फ़ एक कुर्सी रखी थी।
अमन हमेशा के लिए चला गया था।
उसकी मेज़ पर एक छोटी-सी पर्ची थी—
“आज शायद मैं उससे मिलने जा रहा हूँ… इसलिए अब दूसरी कुर्सी की ज़रूरत नहीं।”
हर शाम अमन अपने घर की बालकनी में दो कुर्सियाँ लगाता था।
एक पर वह बैठता और दूसरी कुर्सी हमेशा खाली रहती।
पड़ोसी अक्सर पूछते, “अमन, दूसरी कुर्सी पर कौन बैठता है?”
वह बस मुस्कुराकर कहता, “मेरी पत्नी।”
लेकिन उसकी पत्नी को गुज़रे तीन साल हो चुके थे।
एक रात पड़ोसी ने हिम्मत करके पूछा, “आप अब भी उनका इंतज़ार करते हैं?”
अमन ने खाली कुर्सी को देखते हुए कहा, “इंतज़ार नहीं करता… बस आदत नहीं बदली।”
फिर उसने धीरे से कहा, “वो रोज़ मेरे पास बैठकर चाय पीती थी। अब चाय सिर्फ़ एक कप बनती है, लेकिन कुर्सी दो ही लगती हैं।”
उस रात अमन की आँखों से आँसू बहते रहे।
सुबह पड़ोसी ने देखा—बालकनी में पहली बार सिर्फ़ एक कुर्सी रखी थी।
अमन हमेशा के लिए चला गया था।
उसकी मेज़ पर एक छोटी-सी पर्ची थी—
“आज शायद मैं उससे मिलने जा रहा हूँ… इसलिए अब दूसरी कुर्सी की ज़रूरत नहीं।”
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