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पापा की पुरानी घड़ी
रवि को अपने पापा की पुरानी घड़ी बिल्कुल पसंद नहीं थी।
वह हमेशा कहता, “पापा, नई घड़ी क्यों नहीं ले लेते? ये तो बहुत पुरानी है।”
पापा मुस्कुराकर कहते, “बेटा, ये घड़ी मुझे तुम्हारी माँ ने दी थी।”
रवि हँसकर बात टाल देता।
एक दिन रवि नौकरी के लिए दूसरे शहर चला गया। पापा हर सुबह उसे फोन करते, लेकिन रवि अक्सर कह देता, “पापा, अभी व्यस्त हूँ… बाद में बात करता हूँ।”
एक रात अचानक पापा की तबीयत बिगड़ गई।
रवि जब तक घर पहुँचा, बहुत देर हो चुकी थी।
कमरे में पापा की वही पुरानी घड़ी मेज़ पर रखी थी।
रवि ने घड़ी उठाई तो उसके पीछे एक छोटा-सा कागज़ चिपका था—
“जब भी बेटा मुझे समय नहीं दे पाए, मैं इस घड़ी को देखकर खुद को समझा लेता था कि उसका समय अभी आएगा।”
रवि घड़ी को सीने से लगाकर रो पड़ा।
उस दिन उसके पास दुनिया का सारा समय था…
लेकिन जिस इंसान के लिए वह समय चाहता था, वह अब हमेशा के लिए जा चुका था।
रवि को अपने पापा की पुरानी घड़ी बिल्कुल पसंद नहीं थी।
वह हमेशा कहता, “पापा, नई घड़ी क्यों नहीं ले लेते? ये तो बहुत पुरानी है।”
पापा मुस्कुराकर कहते, “बेटा, ये घड़ी मुझे तुम्हारी माँ ने दी थी।”
रवि हँसकर बात टाल देता।
एक दिन रवि नौकरी के लिए दूसरे शहर चला गया। पापा हर सुबह उसे फोन करते, लेकिन रवि अक्सर कह देता, “पापा, अभी व्यस्त हूँ… बाद में बात करता हूँ।”
एक रात अचानक पापा की तबीयत बिगड़ गई।
रवि जब तक घर पहुँचा, बहुत देर हो चुकी थी।
कमरे में पापा की वही पुरानी घड़ी मेज़ पर रखी थी।
रवि ने घड़ी उठाई तो उसके पीछे एक छोटा-सा कागज़ चिपका था—
“जब भी बेटा मुझे समय नहीं दे पाए, मैं इस घड़ी को देखकर खुद को समझा लेता था कि उसका समय अभी आएगा।”
रवि घड़ी को सीने से लगाकर रो पड़ा।
उस दिन उसके पास दुनिया का सारा समय था…
लेकिन जिस इंसान के लिए वह समय चाहता था, वह अब हमेशा के लिए जा चुका था।
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