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माँ का आख़िरी खाना

रात के करीब दस बजे बेटा ऑफिस से घर लौटा।

माँ ने दरवाज़ा खोलते हुए कहा, “बेटा, खाना लगा दूँ?”

बेटे ने थके हुए स्वर में कहा, “नहीं माँ, बाहर खा लिया।”

माँ चुपचाप रसोई में चली गई।

टेबल पर बेटे की पसंद का खाना रखा था—गरम रोटियाँ, दाल और खीर।

माँ ने खाना वापस रख दिया और अकेले ही थोड़ा-सा खा लिया।

अगली सुबह बेटे को शहर से बाहर जाना था। जाते समय माँ ने कहा, “जल्दी वापस आ जाना… इस बार तेरी पसंद की पूरी थाली बनाऊँगी।”

बेटा मुस्कुराकर बोला, “हाँ माँ।”

लेकिन रास्ते में उसे खबर मिली कि माँ को अचानक दिल का दौरा पड़ा है।

वह घर पहुँचा तो माँ जा चुकी थी।

रसोई में एक बर्तन ढका हुआ था।

उसने काँपते हाथों से ढक्कन हटाया।

अंदर वही खीर थी।

साथ में एक छोटी-सी पर्ची रखी थी—

“कल बेटा थका हुआ था, इसलिए नहीं खाया… आज आएगा तो अपने हाथ से खिलाऊँगी।”

बेटा फूट-फूटकर रोने लगा।

उस दिन घर में खाना बहुत था…

बस माँ नहीं थी, जो हर निवाले में प्यार परोसती थी।
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