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एम. एस. सुब्बुलक्ष्मी की प्रेरणादायक कहानी
एम. एस. सुब्बुलक्ष्मी का जन्म 16 सितंबर 1916 को मदुरै, तमिलनाडु में हुआ था। उनका पूरा नाम मदुरै षण्मुखवडिवु सुब्बुलक्ष्मी था। बचपन से ही उन्हें कर्नाटक शास्त्रीय संगीत का वातावरण मिला और उन्होंने बहुत कम उम्र में संगीत सीखना शुरू कर दिया।
उन्होंने छोटी उम्र में ही सार्वजनिक मंचों पर गाना शुरू कर दिया। उनकी आवाज और संगीत की गहराई ने लोगों का ध्यान आकर्षित किया और धीरे-धीरे वे दक्षिण भारत से निकलकर पूरे देश में प्रसिद्ध हो गईं।
उन्होंने फिल्मों में भी काम किया, लेकिन बाद में अपना मुख्य ध्यान शास्त्रीय संगीत पर केंद्रित किया। उनके भजन और कर्नाटक संगीत की प्रस्तुतियां भारत के साथ-साथ विदेशों में भी लोकप्रिय हुईं।
1966 में उन्होंने संयुक्त राष्ट्र के कार्यक्रम में प्रस्तुति देकर भारतीय शास्त्रीय संगीत को अंतरराष्ट्रीय मंच पर पहुंचाया।
उन्हें भारत रत्न, रेमन मैग्सेसे पुरस्कार और पद्म भूषण सहित कई प्रतिष्ठित सम्मान मिले। वे भारत रत्न पाने वाली पहली संगीत कलाकार थीं।
एम. एस. सुब्बुलक्ष्मी का निधन 11 दिसंबर 2004 को हुआ, लेकिन उनकी संगीत विरासत आज भी जीवित है।
सीख: एम. एस. सुब्बुलक्ष्मी की कहानी बताती है कि किसी कला में महान बनने के लिए प्रतिभा के साथ वर्षों का अभ्यास, अनुशासन और अपनी कला के प्रति पूरी निष्ठा जरूरी होती है।
एम. एस. सुब्बुलक्ष्मी का जन्म 16 सितंबर 1916 को मदुरै, तमिलनाडु में हुआ था। उनका पूरा नाम मदुरै षण्मुखवडिवु सुब्बुलक्ष्मी था। बचपन से ही उन्हें कर्नाटक शास्त्रीय संगीत का वातावरण मिला और उन्होंने बहुत कम उम्र में संगीत सीखना शुरू कर दिया।
उन्होंने छोटी उम्र में ही सार्वजनिक मंचों पर गाना शुरू कर दिया। उनकी आवाज और संगीत की गहराई ने लोगों का ध्यान आकर्षित किया और धीरे-धीरे वे दक्षिण भारत से निकलकर पूरे देश में प्रसिद्ध हो गईं।
उन्होंने फिल्मों में भी काम किया, लेकिन बाद में अपना मुख्य ध्यान शास्त्रीय संगीत पर केंद्रित किया। उनके भजन और कर्नाटक संगीत की प्रस्तुतियां भारत के साथ-साथ विदेशों में भी लोकप्रिय हुईं।
1966 में उन्होंने संयुक्त राष्ट्र के कार्यक्रम में प्रस्तुति देकर भारतीय शास्त्रीय संगीत को अंतरराष्ट्रीय मंच पर पहुंचाया।
उन्हें भारत रत्न, रेमन मैग्सेसे पुरस्कार और पद्म भूषण सहित कई प्रतिष्ठित सम्मान मिले। वे भारत रत्न पाने वाली पहली संगीत कलाकार थीं।
एम. एस. सुब्बुलक्ष्मी का निधन 11 दिसंबर 2004 को हुआ, लेकिन उनकी संगीत विरासत आज भी जीवित है।
सीख: एम. एस. सुब्बुलक्ष्मी की कहानी बताती है कि किसी कला में महान बनने के लिए प्रतिभा के साथ वर्षों का अभ्यास, अनुशासन और अपनी कला के प्रति पूरी निष्ठा जरूरी होती है।

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