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Shivaji Gaikar
!! एक गरीब किसान की कहानी!! रामू गाँव का एक गरीब और मेहनती किसान था, जिसका पूरा जीवन मिट्टी और पसीने से जुड़ा था।
उसके पास ज़मीन का एक छोटा सा टुकड़ा था, जिसे वह भोर से लेकर देर रात तक कड़ी मेहनत से सींचता था।
इस साल फसल बोने के लिए उसने साहूकार से भारी ब्याज पर कर्ज़ लिया था।
कड़कती धूप हो या हाड़ कंपाने वाली ठंड, उसने दिन-रात खेत में पसीना बहाया।
उसके छोटे-छोटे बच्चों को उम्मीद थी कि फसल बिकने पर उन्हें पेट भर खाना और नए कपड़े मिलेंगे।
हरी-भरी फसल को देखकर रामू अपनी गरीबी और थकान सब भूल जाया करता था।
लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंज़ूर था; कटाई के कुछ ही दिन पहले भयंकर सूखा पड़ गया।
देखते ही देखते उसकी महीनों की मेहनत और लहलहाती फसल आँखों के सामने जलकर राख हो गई।
फटी हुई ज़मीन की तरह ही रामू का दिल भी कई टुकड़ों में टूट गया।
रात को भूखे पेट सोते बच्चों और पत्नी की सिसकियाँ सुनकर उसका कलेजा काँप उठता था।
सुबह होते ही साहूकार दरवाज़े पर आकर गालियाँ देता और ज़मीन छीनने की धमकी देता।
रामू हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाता रहा, पर कर्ज़ की आग में दया की कोई जगह नहीं थी।
जिस किसान के उगाए अनाज से पूरी दुनिया का पेट भरता है, उसके अपने घर में चूल्हा तक नहीं जल रहा था।
कर्ज़ चुकाने के लिए उसने अपनी पत्नी के बचे-कुचे गहने और बर्तन तक बेच दिए।
फटे हुए कपड़ों और खाली पेट के साथ वह हर दिन बेबसी से आसमान की तरफ़ देखता।
साहूकार का डर और बदनामी का बोझ उसे रात भर सोने नहीं देता था।
जिस मिट्टी को उसने अपनी माँ की तरह पूजा था, वही मिट्टी आज उसकी लाचारी पर खामोश थी।
दुनिया उसे कागज़ों पर 'अन्नदाता' कहती रही, लेकिन किसी ने उसकी भूख और दर्द को नहीं समझा।
सीने में दुखों का पहाड़ लिए, वह हर सुबह फिर एक नई आस में सूखी ज़मीन की तरफ़ चल पड़ता।
यह सिर्फ़ रामू की कहानी नहीं, बल्कि उस हर किसान की खामोश दर्दभरी दास्तान है जो पूरी दुनिया को पालकर भी खुद भूखा सोता है।
उसके पास ज़मीन का एक छोटा सा टुकड़ा था, जिसे वह भोर से लेकर देर रात तक कड़ी मेहनत से सींचता था।
इस साल फसल बोने के लिए उसने साहूकार से भारी ब्याज पर कर्ज़ लिया था।
कड़कती धूप हो या हाड़ कंपाने वाली ठंड, उसने दिन-रात खेत में पसीना बहाया।
उसके छोटे-छोटे बच्चों को उम्मीद थी कि फसल बिकने पर उन्हें पेट भर खाना और नए कपड़े मिलेंगे।
हरी-भरी फसल को देखकर रामू अपनी गरीबी और थकान सब भूल जाया करता था।
लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंज़ूर था; कटाई के कुछ ही दिन पहले भयंकर सूखा पड़ गया।
देखते ही देखते उसकी महीनों की मेहनत और लहलहाती फसल आँखों के सामने जलकर राख हो गई।
फटी हुई ज़मीन की तरह ही रामू का दिल भी कई टुकड़ों में टूट गया।
रात को भूखे पेट सोते बच्चों और पत्नी की सिसकियाँ सुनकर उसका कलेजा काँप उठता था।
सुबह होते ही साहूकार दरवाज़े पर आकर गालियाँ देता और ज़मीन छीनने की धमकी देता।
रामू हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाता रहा, पर कर्ज़ की आग में दया की कोई जगह नहीं थी।
जिस किसान के उगाए अनाज से पूरी दुनिया का पेट भरता है, उसके अपने घर में चूल्हा तक नहीं जल रहा था।
कर्ज़ चुकाने के लिए उसने अपनी पत्नी के बचे-कुचे गहने और बर्तन तक बेच दिए।
फटे हुए कपड़ों और खाली पेट के साथ वह हर दिन बेबसी से आसमान की तरफ़ देखता।
साहूकार का डर और बदनामी का बोझ उसे रात भर सोने नहीं देता था।
जिस मिट्टी को उसने अपनी माँ की तरह पूजा था, वही मिट्टी आज उसकी लाचारी पर खामोश थी।
दुनिया उसे कागज़ों पर 'अन्नदाता' कहती रही, लेकिन किसी ने उसकी भूख और दर्द को नहीं समझा।
सीने में दुखों का पहाड़ लिए, वह हर सुबह फिर एक नई आस में सूखी ज़मीन की तरफ़ चल पड़ता।
यह सिर्फ़ रामू की कहानी नहीं, बल्कि उस हर किसान की खामोश दर्दभरी दास्तान है जो पूरी दुनिया को पालकर भी खुद भूखा सोता है।
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