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अधूरा वादा

विवेक ने जाते समय अपनी छोटी बहन से कहा था, “राखी पर पक्का घर आऊँगा।”

बहन ने मुस्कुराकर कहा, “इस बार झूठ मत बोलना।”

विवेक ने उसके सिर पर हाथ रखा, “इस बार बिल्कुल नहीं।”

राखी का दिन आया। बहन सुबह से दरवाज़े की तरफ़ देखती रही।

दोपहर हुई… शाम हुई… लेकिन विवेक नहीं आया।

रात में फोन आया।

“दीदी… भैया का एक्सीडेंट हो गया था। उन्हें बचाया नहीं जा सका।”

बहन कुछ देर तक चुप रही।

फिर उसने धीरे से राखी उठाई और अपने हाथ में बाँध ली।

माँ रोते हुए बोली, “बेटी, ये क्या कर रही है?”

बहन ने आँसू पोंछकर कहा—

“उसने वादा किया था कि राखी पर आएगा… अब वो नहीं आ सकता, तो मैं ही उसका वादा पूरा कर देती हूँ।”

उस रात घर में राखी बंधी…

लेकिन पहली बार भाई की कलाई खाली थी।
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